हिंदी दिवस और हिंदी पत्रकारिता की सार्थकता

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हिंदी दिवस और हिंदी पत्रकारिता की सार्थकता

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया। बाद में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। पहला आधिकारिक हिन्दी दिवस 14 सितंबर 1953 को मनाया गया था।

हिंदी पत्रकारिता का नया रूप

14 सितंबर को देश भर में हिंदी दिवस मनाया जाता है और एक बार फिर हिंदी भाषा के महत्व और उसके प्रचार प्रसार की बात जोर शोर से की जाएगी, ये अलग बात है कि दुनिया की प्रमुख भाषाओं में से एक हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी ने हिंदी पत्रकारिता में अपना स्वरुप बदला है । चाहे हिंदी अखबार देखें या हिंदी  चैनल, एक बात साफ दिखती है कि कहीं भी हिंदी भाषा की शुचिता और शुद्धता का आग्रह नहीं बचा, ठीक भी है सब पत्रकारिता ही कर रहे हैं, हिंदी का संरक्षण करने का उन्होंने कभी वादा किया भी नहीं था. हालाँकि गत दो दशकों में जिस तीव्रता से प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया का विस्तार हुआ है, जाहिर तौर पर उसमें हिंदी भाषा की बड़ी भूमिका है। मीडिया के माध्यम से देश में एक नए बाजार का सृजन हुआ है। इस बाजार की मांग है कि उसके उत्पाद का संदेश उस भाषा में हो जिसे उपभोक्ता तुरंत समझ ले और प्रोडक्ट की खूबियों को आत्मसात कर ले। हाल ही में प्रचलित लॉक डाउन, क्वारंटाइन, न्यू  नार्मल, ऑबजरवेशन, आईसीयू,  एफआईआर, प्राइवेट स्कूल, ऐसे हजारों शब्द हैं जो हमारी जुबान पर गहरी पैठ कर चुके हैं कि हम चाहकर भी उनका विकल्प नहीं ढूंढ सकते। यानी अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं का हिंदी में प्रवेश जारी है। हिंदी भाषा पर घोर संकट है और विदेशी भाषाओं का हिंदी में आक्रमण दूध में शक्कर की तरह घुल-मिल चुका है।

भाषा की चिंता करने वाले पत्रकार साहित्यकार बनते गए

आज मीडिया का साहित्य से रिश्ता लगभग खत्म हो चुका है। अच्छा साहित्य ही भाषा के संस्कार पैदा करता है। जो हिंदी की अस्मिता यानी हिंदी की रक्षा में लगे थे वे पत्रकार की बजाए साहित्यकार की श्रेणी में आते गए |. कोई शोध तो उपलब्ध नहीं है लेकिन सामान्य अनुभव है कि इस समय देश के पाठक और श्रोताओं में विभिन्न भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, खासतौर पर हिंदी की बोलचाल में अंग्रेजी और उर्दू के बहुप्रचलित शब्दों के इस्तेमाल से किसी को कोई परहेज़ नहीं बचा. यही मिश्रभाषा आज हिंदी पत्रकारिता की भाषा है |

भाषा की रक्षा पत्रकारिता का काम है भी या नही?

बेहतर संवाद के लिहाज से भाषायी शुद्धता और पूर्णता बेहद जरूरी हो जाती है। जब बात हिंदी में पत्रकारिता  की आएगी तो यहां भाषायी शुद्धता, स्पष्टता और उपयोग में दक्षता अहम हो जाती है। तकनीकी के वर्तमान दौर में हिंदी पत्रकारिता में उपयोग होने वाली भाषा का रूप भी विकृत हुआ है। पत्रकारिता समाज में क्या प्रभाव डालती है, इसका निर्धारण इससे होता है कि उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली भाषा का कैसा उपयोग होता है। परंपरागत मीडिया की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि भाषा के महत्त्व से किसी तरह का कोई समझौता न हो, उसके लिए पत्रकार एवं लेखक व्यक्तिगत एवं पेशेवर जीवन में गहन एवं गंभीर अध्ययन करते थे ताकि भाषा को लेकर स्थापित मानकों के साथ कोई समझौता न हो पाय । लेकिन सोशल मीडिया जैसे मीडिया के नवीन माध्यमों के आगमन के साथ ही ये भाषायी प्रतिबद्धताएं हाशिए की ओर खिसक गईं। अब किसी के पास इतना वक्त ही नहीं बचा कि कुछ लिखने से पहले पर्याप्त स्व-अध्ययन भी कर सके। शब्दों और व्याकरण के स्तर पर पाई जाने वाली त्रुटियां मुख्यधारा के परंपरागत मीडिया में आम तौर पर दृष्टिगत हो जाती हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि मीडिया संस्थानों में प्रूफिंग डेस्क लगातार खत्म हो रही है । मीडिया जगत में भाषा के स्तर पर जो संकट पैदा हुआ है, वह चिंताजनक है। मीडिया की विश्वसनीयता यदि बनाए रखनी है तो प्रमाणित और निष्पक्ष खबर के साथ-साथ भाषायी पवित्रता को भी जिंदा रखना होगा। तभी हिंदी पत्रकारिता अपने निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंच सकेगी ।

जोर हिंदी पर या पत्रकारिता पर

हिंदी दिवस पर पत्रकारिता पर होने वाले औपचारिक विमर्श पर अगर कोई विषय तय करना हो तो सबसे पहले जो सवाल उठना चाहिए कि जोर हिंदी भाषा पर होना चाहिए या पत्रकारिता पर उत्तर निकलकर आ सकता है कि उस पत्रकारिता पर संकट ज्यादा है जो हिंदी भाषा में हो रही है. यह कोई छोटा संकट नहीं है । आज भी हमें उन स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है जो अपनी सूचनाएं अंग्रेजी में देते हैं. आज दुनिया भर में जो भी शोधकार्य हो रहे हैं उनकी रिपोर्ट अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो पाती है । खबर की सूचना तुरंत देने की बाध्यता के कारण हिंदी इस काम में पिछड़ जाती है. अनुुवाद करने में काफी वक्त लगता है. इस तरह यह मुश्किल हिंदी से ज्यादा उस भाषाई पत्रकारिता की है जो हिंदी विशेषण के साथ की जाती है|

तथ्यात्मक पत्रकारिता में हिंदी की स्थिति

खासतौर पर खोजी पत्रकारिता में खबरों में हमेशा तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष देने की जरूरत होती है तथ्य और आंकड़ों के विश्लेषण अत्यंत जरूरी माने जाते हैं और यह रिसर्च हिंदी में आज तक दुर्लभ है यही वह चीज़ है जो पत्रकारिता के उत्पाद की विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है माना जा सकता है हिंदी में कुछ लोग गुणवत्तापूर्ण शोधकार्य कर रहे हों लेकिन यह भी दावे के साथ कह सकते है कि हमें मीडिया में उनके शोध की सूचना कहीं नहीं दिखती है, इतना ही नहीं विश्वस्तरीय बनने की चाह रखने वाले विश्वविद्यालयों में शोधकार्यों की रिपोर्ट हिंदी भाषा में लिखकर जमा होने की भी संतोषजनक जानकारी देखने को नहीं मिलती है । अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि हिंदी पत्रकारिता अब अपने उपर एक भरापूरा शोधकार्य हिंदी में ही शुरू करने की मांग कर रही है ।

 

लेखक – योगेश पटेल
सहायक प्रोफेसर, जेएलयू

 

About-

Prof. Yogesh Patel, Assistant Professor, Jagran Lakecity University

JLU Yogesh Patel
Prof. Yogesh Patel

Education: M.Phil.(Media Studies), MBA(Entertainment Communication), UGC-NET(Mass Communication & Journalism), PG Diploma in Environment: Law, Science & Technology, BBA, BJC

Area of specialization: Entertainment Communication, Mass Communication & Journalism, Print Media.

Number of research papers published: 3

Number of books published/edited: 0

Brief Summary: Mr. Yogesh Patel joined School of Media and Communication, Jagran Lakecity University as Assistant Professor. He is a young UGC-NET qualified academician and researcher in the field of Communication & Media Management. Yogesh completed his MBA (Entertainment Communication) and M.phil.(Media Studies) on Need of Media Management studies in the present age: A critical analysis from the Department of Management, Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism & Communication, Bhopal. In the areas of research he has presented three research Papers in International Conferences in India. His areas of interests in teaching include Journalism, Mass Communication, Entertainment Communication. Recently he is elected as Joint Secretary of Public Relations Society of India, Bhopal Chapter.

Prior to joining JLU in his current position, Yogesh worked for Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism & Communication as a Guest Lecturer and Raj Express Daily Newspaper as Sub Editor. He has also worked for Arisen Publication in Bhopal as Content Editor where he was responsible for handling editorial & translation activities as well. When not working, he enjoys travelling, reading, listening to music-especially classical and company of friends. He strongly believes in experiential learning.

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